सरसी : गुजरते वक्त के साथ न सरसी के कलाओं का भी कहुत कमी होता जा रहा है. एक जमाने में सरसी के लोग सभ चाक के बर्तनों पर ही काम हुआ करते थे, परंतु आज के इस आधुनिक युग के स्टील और फाइबर के बढ़ते क्रेज में चाक की यादें धुंधली पड़ती जा रही है. कुम्हार वर्ग हमारे समाज का एक अभिन्न अंग है. कई वर्षों से दिवाली के त्योहार को हम कुम्हार के हाथों से बने दिए से हीं मनाते आये है. कुम्हार के हाथों बने मिट्टी के बर्तन और अन्य सामानो की भी पुराने काल में काफी महत्ता रही है. परंतु आज के आधुनिक युग में कुम्हारों का तो अस्तित्व हीं कम होता जा रहा है. इनका स्थान आज कल प्लास्टिक एवं स्टील के बर्तनों के साथ पर दिवाली पर आज कल लोग सभ इलेक्ट्रिक बल्बों ने ले लिया है. लोग आज कल दियों के स्थान पर बिजली बल्ब जलाकर लक्ष्मी को खुश करने की दौड़ में शामिल हो गए हैं. लेकिन धार्मिक एवं वैज्ञानिक दोनों हीं दृष्टिकोणों में मिट्टी के बर्तनों एवं सामानों का प्रयोग हीं लाभकारी होता है. परंतु लोग आधुनिक होते जा रहे हैं, कुम्हारों का कहना है की आज कल उनके लिए अपने और अपने परिवार का भरण - पोषण करना भी मुश्किल हो गया है. अगर लोगों को उनकी याद आती है भी तो सिर्फ दिवाली पर. बाकी 11 महीने तो उन्हें दो वक्त कि रोटी जुटाने पर भी मुश्किल हो जाती है. सरकार की ओर से भी कुम्हार वर्ग के लिए कोई सहायता मुहैया नहीं कराई जाती है. यह सच है की कुम्हार बेहद ही उच्चस्तरीय कलाकार हैं इनकी खुबसूरत कला की जितनी भी तारिफ की जाये वो कम है परंतु ये कला अब समाप्ती के कगार पर है. सरकार को चाहिये की इस खुबसूरत कला को बचाये रखने के लिये कुम्हारों के सर्वेक्षण के लिये कोई खास योजना बनाये तभी इस अद्भुत कला को बचाया जा सकता है.
