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सोमवार, 20 जून 2016

पूर्णिया सहित कई जिलों में रिफुजी बनकर रह गए बंगाली शरणार्थी

सन् 1947  में भारत पाकिस्तान बटवारे के बाद पूर्वी पाकिस्तान को छोडकर भारत लौटे हिन्दू आज अपने देश में ही रिफुजी बनकर रह गए है! आजादी के 69 साल बाद भी यह महज राजनीति पार्टी का वोट बैंक बनकर रह गया है!भारत पाकिस्तान(बांग्लादेश) बिभाजन के बाद पुरे देश में बंगालियों को टुकड़ो टुकड़ो में बांट कर बसाया गया ।जिन्हें जमीन मिली पर मालिकाना हक़ नहीं मिला,जाति  है पर मान्यता नहीं मिला,यहाँ तक की मातृभाषा से भी वंचित किया गया! तत्कालीन केंद्र की सरकार ने पश्चिम चम्पारण,पूर्वी चम्पारण,पूर्णिया, कटिहार,भागलपुर, सहरसा,गोपालगंज में बंगाली शरणार्थी को बसाया था! इसके अलावा दरभंगा,अररिया,छपरा,गया,जमालपुर,मुंगेर में बसाया गया! आज इस समाज की सामाजिक,आर्थिक,शैक्षणिक स्थिति बद से बत्तर है! बंगाली समाज कई वर्षो से शरणार्थी विकास प्राधिकरण की स्थापना की मांग कर रही है मगर आज तक इनकी मांग को अनसुनी करती आ रही है! 27 मई 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नितीश कुमार एवं उप मुख्यमंत्री सुशिल मोदी  ने शरणार्थी परिवार कि सामाजिक,आर्थिक,जाति प्रमाण पत्र,शिक्षा एवं नौकरी सबंधी समस्याओं को चिन्हित करने के लिए बिहार बंगाली समिति को एक सर्वेक्षण करने के लिए कहा था जिसके बाद बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने आद्री नामक संस्था से पूर्वी पाकिस्तान से आये शरणार्थीयो  सर्वेक्षण कराया गया जिसमे यह साफ़ हो गया की इनकी माली हालत ठीक नहीं और जानबूझकर इन्हे इनके सभी अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है! आज की स्थिति में पुरे भारत में एक मात्र सिर्फ बंगाली अपनी मातृभाषा में शिक्षन और पिछड़ी जाती के दर्जे के लिए जूझ रहे है जो की इनका संबैधानिक अधिकार है! आज बिहार में बसाये गये शरणार्थी समाज के जमीन एवं मकान को हरपा जा रहा है, पूर्वी चम्पारण में तो हनुमानगढ़ शरणार्थी कॉलोनी की करीब 32 एकड़ जमीन पर दबंगो ने कब्ज़ा कर लिया है! जमीन का स्वमित्व एवं पर्चा  देने के सम्बन्ध में सरकार राजस्व एवं भूमि सुधर विभाग पत्रांक 4-7 /85-86 रा.मु दिनांक 28 अगस्त 1986 द्वारा आदेश निर्गत कर चुका है की शरणार्थीयो को जमीन का स्वमित्व मिले  मगर आज तक इन्हे परचा नहीं मिला है! 69 साल पहले मिले छोटे से जमीन पर अब लोग नानी दादी पोते वाले लोग हो चुके है अब ये लोग परचा न मिलने से आपस में जमीन भी नहीं बटवारा कर पा रहे है! अविभाजित जमीन नहीं दिखाने के कारण एक ही राशन कार्ड में मुट्ठीभर अनाज से काम चलाना पडता है! सबसे ज्यादा हास्पद बात यह है की इन शरणार्थी को शहर से दूर बसाया गया है, कितनो की जमीन या तो नदी में समां गई है या फिर सरकार ने ही सड़क बनाने के लिए ले लिया है! इसके एवज में आज तक न इन्हे मुआवजा मिला है न जमींन! परिवार का दायरा बढ़ने के साथ ही अब ये लोग रोड किनारे रहने पर मजबूर है!

हिन्दू शरणार्थी को पश्चिम बंगाल,ओडिशा,आसाम, मेघालय,त्रिपुरा,मिजोरम इत्यादि राज्यों में भी पुनर्वासित किया गया था, इन राज्यों में सबंधित सरकारों ने अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया है किन्तु बिहार में यह सुविधा स्वीकृत नहीं किया गया!

> > *शिक्षा- बिहार में सिर्फ़ 16.2 प्रतिशत बांग्लाभाषी ही मेट्रिक या उच्चतर शिक्षा ग्रहण कर पाये है!
> > *मातृभाषा- दो तिहाई लोग अपना भाषा न लिख सकते है न पढ़ सकते है!
> > *पेशा- 43.7 प्रतिशत बांग्लाभाषी अनियमित मजदूर है!
> > *नौकरी- 3.3 प्रतिशत ही सरकारी नौकरी में है!
> > *आय- 56.6 प्रतिशत परिवार की वार्षिक आय 3 हज़ार से कम है!
> > *लालकार्ड- 15 प्रतिशत लोग के पास ही लाल कार्ड है!
> > *राशनकार्ड- 30 प्रतिशत के पास राशनकार्ड नहीं है!
> > *वोटरकार्ड - 20 के पास वोटर कार्ड नहीं है!
> > *घर- 46.1 प्रतिशत के पास फुस का घर है!
> > *पेयजल- 23 प्रतिशत सामुदायिक पंप एवं 60 प्रतिशत कुँए के पानी पर निर्भर है!
> > *शौचालय- 61 प्रतिशत लोग आज भी खुले में शौच करते है!
 





आज की स्थिति में पुरे भारत में एक मात्र सिर्फ बंगाली अपनी मातृभाषा में शिक्षण और पिछड़ी जाती के दर्जे के लिए जूझ रहे है जो की इनका संबैधानिक अधिकार है ।और इस ओर शासन का ध्यान ला कर ही रहेगे,हम भीख नहीं मांग रहे है मातृभाषा हमारी न्यायिक मांग है जो हमें मिलना चाहिये! सरकार से हम मांग करते है की 60 हज़ार थारुओं के लिए जिस तरह थरुहट विकास प्राधिकरण बनाया, उसी प्रकार 4 लाख 50 हज़ार विस्थापित शरणार्थी आवादी के देखरेख के लिए शरणार्थी विकास प्राधिकरण बनाये! 

डॉ.कैप्टन दिलीप कुमार सिन्हा
केंद्रीय अध्यक्ष , बिहार बंगाली समिति,पटना






 
राजनैतिक पार्टिया अल्पसंख्यको की बात तो करती है मगर कुछ करती नहीं, बात करके अपनी अपनी रोटिया सेकते है ।और चुनाव खत्म हो जाने के बाद सब भूल जाते है ।हमारे देश के प्रति पूर्वजो का बलिदान हम जाया नहीं होने देंगे उन्हें वो सम्मान दिलाकर छोड़ेंगे जिस सम्मान के वो हक़दार है ।यह लड़ाई हम दिल्ली तक लेकर जायँगे!देश के सविधान की धारा 29 एवं 350ए के तहत सरकारी स्कूलो एवं कॉलेजो में मातृभाषा की पढाई की सुविधा सरकार द्वारा मुहैया किया जाना है! लेकिन दुर्भाग्य से 22 हज़ार बांग्लाभाषी छात्र 2010 से बंगला पुस्तक का इंतज़ार कर रहे है!हमारे पास टीईटी पास अभ्यर्थी भी उपलब्ध है! जब तक सरकार हमारी माँगे नहीं मानती है तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा!

दिलीप दास
संयुक्त सचिव
बिहार बंगाली समिति 


>> सरकार के कथनी और करनी में अंतर                                                                                   

आश्वासन के वावजूद भी बांग्लाभाषी छात्र छात्राओ को मातृभाषा पढ़ने के सुविधा देने में बिहार सरकार उदासीनता बरत रही है!बिहार राज्य के सरकारी प्राथमिक,मध्य एवं उच्च विधालयो में बंगला भाषा शिक्षक के लिए उर्दू के साथ साथ बंगला भाषा के लिए भी विशेष टीईटी परीक्षा ली गई थी! लेकिन लालफितशाही के कारण जिस विधालय में 40 से अधिक बांग्लाभाषी छात्र है वहा आज तक बांग्ला शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो पायी है! मध्य विधालय एवं उच्च माध्यमिक विधालय में तो अभी तक सरकार ने कोई पद ही सृजन नहीं किया है जिसका परिणाम यह है की बच्चे को न अपनी मातृभाषा लिखना आता है न पढ़ना! या यूँ कहे की सरकार जानबूझ कर बांग्लाभाषी छात्रो को उनके अधिकार से वंचित कर रही है! जो छात्र इंटरमीडिएट की परीक्षा बंगला से पास कर लिए है उन्हें भी बंगला प्रतिष्टा की पढाई अपनी भाषा में करने से निदेशक उच्च शिक्षा द्वारा रोका जा रहा है! छात्रो को उच्च शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति ही नहीं दी जा रही है! बंगला भाषा को दफ़न करने की तैयारी यही तक नहीं रुकी, बिहार लोक सेवा आयोग में सहायक प्राध्यापक के रिक्त पद पर नियुक्ति की सुचना निकाली गई थी लेकिन रिक्त पद रहने के वावजूद बांग्लाभाषा के कोई भी रिक्ति का प्रदर्शन नहीं किया गया! शिक्षको के नियुक्ति के सबंध में मार्गनिर्देशिक में यह स्पष्ट है की बंगला,मैथली,उर्दू और संस्कृत में ऐसे विषयो के लिए मुख्यालय स्तर से उन विधालयो को चिन्हित करना होगा जंहा सम्बंधित भाषा को पढ़ने वाले न्यूनतम 40 छात्रो की उपलब्धता हो! बिहार के पूर्णिया,किशनगंज,भागलपुर, कटिहार के बलरामपुर, किशनगंज और चंपारण जिले में ऐसे कई स्कूल है जहा ऐसे विधार्थियो की संख्या बहुत ज्यादा है,इसके वावजूद यहाँ बंगला शिक्षक की नियुक्ति नहीं की गई है!