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सोमवार, 5 सितंबर 2016

कभी बनमनखी की शान हुआ करता था चीनी मिल

बनमनखी के ससक्त आर्थिक भूतकाल का स्मृति चिन्ह ।
बनमनखी का चीनी मिल कभी यहाँ काम करने वाले लगभग एक हजार कर्मचारी और लाखो किशानो ,मजदूर ,छोटे बड़े दुकानदार ,वाहन चालक साथ ही बाहर से आनेवाले देश के नामी गिरामी सर्कस ,थियेटर खेल तमासे वाले (जो बिहार के मात्र 2-3जगह जाते थे) रोजी रोजगार का साधन था ।
97 से मिल  बन्द होने से पहले लगता था बनमनखी में साक्षत लक्ष्मी विराजमान थी ।
जिन्हें वो दिन याद होगया होगा उनके मुह से आह् जरूर निकला होगा ।
अब तो बस यादे है ।
ससक्त राजनितिक और जनशक्ति के इच्छा के आभाव के कारण आज बनमनखी आर्थिक बदहाली का शिकार है । जनान्दोल की कमी,जनप्रतिनिधि की उदासीनता और राजनेताओं की कोरी भाषण का ज्वलंत व प्रत्यक्ष उदाहरण--बनमनखी चीनी मिल की दयनीय हालात !!!
किसी  समय एशिया की सबसे बड़ी चीनी मिल हुआ करती थी. इस मिल से किसानों को बहुत फायदा होता था. उस समय कोसी और पूर्णिया प्रमंडल के किसान गन्ना उत्पादन में काफी दिलचस्पी लेते थे. नतीजतन, अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन अब यह चीनी मिल दुर्भाग्यवश कई सालों से बंद पड़ी है. इसमें काम करने वाले सैकड़ों मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं और इलाके में अब पहले की तरह गन्ना उपजाना अधिक फायदेमंद नहीं रह गया है. इस वजह से यहां के किसान गन्ने की खेती को प्रमुखता से नहीं लेते. लालू यादव के शासनकाल के दौरान मिल की स्थिति बद से बदतर हो गई. नीतीश कुमार  ने भी यहां के किसानों से चीनी मिल को फिर से खुलवाने को लेकर ढेरों वादे किए, लेकिन वे आज तक हक़ीक़त में तब्दील नहीं हो पाए. इस मिल में काम कर चुके मजदूरों और कर्मचारी कहते हैं कि चीनी मिल बंद होने से उन्हें एवं उनके अन्य मज़दूर साथियों को काफी नुक़सान हुआ. मिल बंद होने से इलाक़े के किसानों की रुचि गन्ने की खेती में पहले के मुक़ाबले कम हो गई है. इलाक़े में कई छोटी-छोटी गुड़ मिलें तो खुल गई हैं, लेकिन किसानों को गन्ने की उचित क़ीमत नहीं मिल पाती. बड़ी-बड़ी गुड़ मिलों के मालिक छोटे किसानों का दोहन करते हैं.
हर चुनाव में भरोसा दिया जाता है कि सालों से बंद पड़ी चीनी मिल को खुलवाया जा सकेगा, लेकिन नतीजा ढाक के वही तीन पात वाला रहा ।
बनमनखी चीनी मिल की स्थापना 1970 में हुई थी. उस समय 55 एकड़ भूमि में स्थित यह मिल पूर्णिया कॉरपोरेशन सुगर फैक्ट्री लिमिटेड के अधीन थी, लेकिन बिहार सुगर एक्विजिशन एक्ट के तहत 1977 में इसे बिहार सरकार ने अपनी निगरानी में ले लिया, मगर पर्याप्त मात्रा में गन्ना, बिजली और पानी उपलब्ध न हो पाने की वजह से 1997 में यह चीनी मिल बंद हो गई. एसबीआई कैपिटल मार्केट्‌स लिमिटेड (एसबीआईसीएपी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 1980 में बिहार में 28 चीनी मिलें थीं, जिनकी क्रसिंग कैपेसिटी 34 हज़ार टन थी. इन सभी मिलों के यूनिट्‌स की प्रगति के लिए बिहार सरकार ने 1974 में बिहार स्टेट सुगर कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया. शुरू में कुछ सालों तक मिल से चीनी का अच्छा उत्पादन हुआ, लेकिन यह ज़्यादा समय तक बरक़रार नहीं रह सका. कम फायदा और अधिक ख़र्च का हवाला देते हुए सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और 1996-97 तक कई चीनी मिलें एक के बाद एक करके बंद होती चली गईं. ।

वर्तमान मुख्य मंत्री नीतीश सरकार ने इन चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने के वादे कई बार किए, लेकिन बात स़िर्फ वादे तक ही सीमित रह गई. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006 के फरवरी महीने में गन्ना विकास आयुक्त के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई गई, जिसने चीनी मिलों के पुनरुद्धार और बंद पड़ी यूनिट्‌स के मूल्यांकन के लिए वित्तीय सलाहकार बहाल करने की योजना बनाई, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार के उदासीन रवैए के चलते कोई भी नतीजा अब तक सामने नहीं आया.
स्थानीये लोगो से जब बात चित की तो उन लोगो ने कहा यह मिल खुलना बहुत जरूरी है ,
इस क्षेत्र के आर्थिक विकाश के लिये ।
उनलोगों ने कई कारण गिनवा दिये ।

चीनी मिल के खुलने से होने वाला फायदा:
1. ग्रामीण अर्थ्वाव्यस्था की तक़दीर बदल जायेगी |
2. खेती के फायदेमंद होते ही हर घर की आमदनी बढ़ जायेगी, खरीदने की क्षमता बढ़ने से विकास में वृद्धि होगी |
3. किसानों और मजदूरों का पलायन रुकेगा |
4. व्यपार  और उद्योग धंधा में नया जान आयेगा और व्यापार बढेगा |
5. नौजवानों में बेरोजगारी कम होगा और हर घर के बच्चे अच्छे स्कूल में पढेंगे |
6. एक बीघा खेती पर लाख रूपया का कमाई होगा |
7. महाराष्ट्र पंजाब के गाँवों के तरह हमारे गाँव में भी संपनता आयेगी |
हमारे प्रधानमंत्री जी देश में दुसरी हरित क्रांति की बात कर रहें हैं तो मुख्य मंत्री राज्य को विकसित बनाना चाहते तो
इस समय बनमनखी के बंद पड़े चीनी मिल के बारे में सोचने का सही वक्त है |

News By - दीपक मिश्रा